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Objective of Maa Geeta Prasaad Trust

उद्देश्य-

1. प्रभु की पूजा-प्रीति के रूप में अपने-अपने जीविकोपार्जन तथा लोक-संग्रह (प्रभु-कृत सृष्टि-चक्र में सहयोग) आदि कर्तव्य-कर्मों में लगे हुए आधिभौतिक (डंजमतपंस) ज्ञान-सम्पन्न अधिकारी बन्धुओं को यह अवगत कराना कि गीता जैसा एक अमृत-ग्रंथ आपके सर्वतोभावेन (सब प्रकार के) कल्याण के लिए विश्व की प्रत्येक राष्ट्रभाषा में उपलब्ध है।
2. विश्व-मान्य संतों तथा ज्ञानी-महापुरुषों द्वारा वर्णित एवं प्रचारित वेदार्थ सार-संग्रह रूप गीता-माहात्म्य को सर्वजन सुलभ कराना।
3. मानव-मात्र के लौकिक एवं पारलौकिक कल्याण हेतु श्रेष्ठ एवं अद्भुत जीवन-ग्रंथ ‘श्रीमद्भगवत् गीता’ के श्रवण, स्वाध्याय, मनन तथा अभ्यास के प्रति अधिकारी बन्धुओंमें अभिरुचि उत्पन्न करना, उत्कण्ठा जागृत करना।

पात्रता:-



1. विश्व-कल्याण और मानव-जीवन के लक्ष्य-प्राप्ति की आंकाक्षा।
2. सनातन वैदिक धर्म के श्रेयस्कर (कल्याण करने वाले) मूलभूत तत्त्वों के प्रति जिज्ञासा।
3. गीता में प्रतिपादित कर्म सिद्धान्त, स्वभाव, स्वधर्म, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, देह-देही, आत्मा-परमात्मा, जीव और ब्रह्म आदि के विषय में जिज्ञासा।
4. जाति, धर्म, पंथ, सम्प्रदाय, रंग, लिंग, भाषा, देश आदि समस्त भेदभाव-रहित 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के जिज्ञासु बन्धु।
5. हठधर्मी, कट्टरपंथी, तथा धर्मान्तरण में संलिप्त बन्धु, जब कभी उनकी अंतरात्मा में इन आसुरी वृत्तियों के फलस्वरूप ग्लानि का भाव जागे। तब गीता कहती है-‘अन्यायी से घृणा मत करो, परन्तु उसके अन्याय-अत्याचार को भी मौन भाव से सहन न करो। अन्याय पर अंकुश लगाने हेतु यदि आवश्यकता हो, कर्त्तव्य की मांग हो तो संघर्ष करो, संहार करो, खुले दिल से दूसरों का व्यापक अर्थों में हित चाहते हुए, जैसा प्रभु स्वयं करते है।